अलादीन का चिराग
सपने में मैंने चिराग घिसा तो आवाज़ आई,
“हुकुम मेरे आका!”
सातवें आसमान पर थी लता। सफेद धुएँ के बीच पलंग पर बैठी कामों की लिस्ट बना रही थी।
बार-बार चिराग घिस रही थी,
और “हुकुम मेरे आका” की आवाज़ सुन-सुनकर इतरा रही थी।
सोच रही थी, अब तो सारे काम चुटकी बजाते ही हो जाएँगे। यह सोचकर फूली नहीं समा रही थी।
तभी आँख खुली तो देखा, पति गुर्रा रहे थे।
“उठकर चाय बनाओ”, फ़रमा रहे थे।
दुखी मन से प्रभु से फ़रियाद लगाई,
“प्रभु! अब तो मुझे भी देदो एक जिन्न,
जो चुटकी में कर दे काम भिन्न-भिन्न।”
प्रभु जी मेरी व्यथा सुन मुस्कुराए और बोले,
“अरे दिया तो है, जो तेरे पीछे खड़ा है।
दूध, दही, आटा, सब्ज़ी, फल- सब तो तेरे हुकुम पर लाता है,
बच्चों को स्कूल छोड़ने जाता है,
तेरे डर से किसी और महिला से आँख तक नहीं मिलाता है,
घर से सीधा दफ़्तर और दफ़्तर से सीधा घर को आता है।
माँ से ‘ज़ोरू का ग़ुलाम’ और न जाने क्या-क्या कहलाता है और फिर भी मुस्कुराता है।”
फिर प्रभु बोले,
“बस फ़र्क़ इतना है कि मैं हँसता हूँ क्योंकि मैं जिन्न घिसने पर भिजवाता हूँ,
और वो मुस्कुराता है क्योंकि वो सारी उम्र घिस-घिसकर, पीस-पीसकर काम चलाता है।”
सच तो यह है कि तुम उसकी और वो तुम्हारा जिन्न है,
इसीलिए तो यह रिश्ता सभी रिश्तों से भिन्न है।
अपने जिन्न को रोज़ काम पर लगाती,
आपकी लता मक्कड़।
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