पत्थरों से भी रिश्ता निभाती, आपकी लता मक्कड़।

By Lata Makkad

कल थप्पड़ खाते ही बचपन की याद आ गई।

पहले माँ मुँह पर थप्पड़ मारती थी मिट्टी निकालने के लिये…

आज डॉक्टर ने मारा नींद से जगाने के लिये – पेट से पत्थर निकालने के बाद।

दरअसल मुझे किडनी में पथरी हुई थी।
शायद बचपन में खाई मिट्टी के कुछ कणों ने मिलकर अपना घरौंदा बना लिया था।

किडनी में बैठी पथरी शोर मचा रही थी -“बाहर निकालो बहन, बड़े दिन से अंदर दबाए हो!
मुझे भी बाहर आने दो, ताज़ी हवा खाने दो… तुम्हारी नहीं तो किसी और फार्म हाउस की शोभा बढ़ाने दो!”

अब वो भी आज़ाद थी… और मैं भी।
हम दोनों अस्पताल के बाहर खड़े मुस्कुरा रहे थे वो मेरे अंदर से बाहर आने के लिये, और मैं अस्पताल से घर जाने के लिये!

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