“सवाल बाद में करना — पहले अपना मोजा निकालो, जो ठूँसा है मेरे मुँह में! ख़ुद सोई हो A/C में, ख़ुशबूदार कम्फ़र्टर में, और मुझे रखा है बदबू और अँधेरों में।”
मैंने कहा — “क्यों हो परेशान मेरी जान? हर जगह तो तुम्हें घुमाती हूँ — कभी मंदिर, कभी पार्क में। अब तू ही बता, है किस फ़िराक में?”
वो हँसी, फिर बोली — “वाह जी, क्या कहने! तेरे सौ किलो वज़न मुझ पर धरती हो, ऊपर से हौले-हौले चलती हो!
बस करो, मेरी जान की दुश्मन, अब तो रहम करो मुझ पर। छोटे-मोटे कीड़े मुझसे मरवाती हो, फिर मुझको बाहर छोड़ — ख़ुद मंदिर के भीतर जाती हो।
मुझमें कीचड़ हो या च्युइंगम, कभी परवाह नहीं करती।
याद रखो — हम जूतों में प्यार है, मेल-मिलाप है। अगर हम में से एक बिछड़ जाए, तो दूजा काम नहीं आता।
एक बार जो पार्टनर चुन लिया — उसे हम बदलते नहीं। हम ज़मीं से जुड़े हैं, सिर पर चढ़ते नहीं।”
अब अपने जूते से भी वजन पर टिप्पणी सुनती, लता मक्कड़
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